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बाल संस्कार शिविर–२०२३: बच्चों में संस्कारों का सिंचन

Writer: Swami Yugal Sharan Ji
Swami Yugal Sharan Ji
Apr 10, 2025
3 min read

Updated: Apr 16, 2025


२४ से ३० दिसम्बर २०२३ के मध्य, ओडिशा के टांगी स्थित शांतमय ब्रज गोपिका धाम में शिक्षा, आनंद और आध्यात्मिक खोज की मनमोहक गूंजें गूँज उठीं। १५ वर्ष की आयु तक के २५० से अधिक बालकों ने बाल संस्कार शिविर में भाग लिया — यह एक सप्ताहीय पहल थी जो समग्र विकास को प्रोत्साहित करती है और चरित्र व भक्ति के संस्कारों को रोपित करती है।


पुनः परिभाषित शिक्षण

शिविर की आधारशिला जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की काव्य रचना 'राधा गोविंद गीत' से प्रेरित प्रसिद्ध पद पर आधारित थी:

"बाल्यावस्था ते ही गोविंद राधे।

कृष्णभक्ति प्रारम्भ कर दे बता दे॥"


एक बुद्धिमान व्यक्ति को बाल्यावस्था से ही भक्ति के मार्ग को अपनाना चाहिए, अन्य सभी प्रयासों को त्यागते हुए। यह दुर्लभ मानव जीवन, यद्यपि क्षणिक है, फिर भी थोड़े प्रयास से भी महान सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

प्रत्येक दिन की रूपरेखा सोच-समझकर तैयार की गई थी, जिसमें आध्यात्मिक उन्नति, बौद्धिक जागरूकता और शारीरिक गतिविधि का समन्वय था। दिन की शुरुआत आरती और कीर्तन से होती थी, जो बच्चों को भक्ति के सुरों में डुबो देती थी। जोश से भरपूर योग और ज़ुम्बा सत्रों ने आपसी मेलजोल को बढ़ाया।


आश्रम के साधक और साधिकाओं ने वेदिक गणित, जीवन कौशल और नैतिक मूल्यों पर आधारित रोचक सत्रों का संचालन किया। वेदिक गणित ने अंकों को खेल का रूप दे दिया, जबकि जीवन कौशल ने व्यावहारिक समझ प्रदान की। हास्य और नैतिक संदेशों से भरपूर चयनित वीडियो बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ गए।


आध्यात्मिक गहराई में उतरना

शिविर का केंद्र बिंदु पूज्यनीय रासेश्वरी देवी जी (माँ) और स्वामी युगल शरण जी (बाबा) के सत्रों में प्रकट हुआ। उनकी दिव्य उपस्थिति ने प्रातः व अपराह्न को सुरमयी कीर्तन, ज्ञानवर्धक प्रश्नोत्तर और आत्मीय संवादों से समृद्ध किया। यह सत्र बच्चों के लिए विश्वास को गहराने, खुलकर जिज्ञासा करने और अपने गुरुओं के प्रेमपूर्ण मार्गदर्शन में स्नेह का अनुभव करने का माध्यम बने।


जीवन कौशल

शिविर का प्रभाव केवल सत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बच्चों के दैनिक जीवन और समग्र स्वास्थ्य पर भी परिलक्षित हुआ। अभिभावकों ने देखा कि बच्चे अब जल्दी उठने लगे, स्वच्छता पर ध्यान देने लगे और भोजन व पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगे। सहयोग और नेतृत्व कौशल को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों ने सेवा भाव को जाग्रत किया — ईश्वर और समाज दोनों के प्रति निःस्वार्थ समर्पण।


आस्था, मित्रता और जीवन मूल्य

शिविर के समापन पर, प्रेम और समुदाय की भावना बच्चों के बीच स्पष्ट दिखी। उन्होंने अपने विश्वास से गहरा जुड़ाव बनाया, सच्चे मित्र बनाए और अच्छे मूल्यों व निःस्वार्थ सेवा से युक्त जीवन के महत्व को समझा। आँसू और आभार से भरे विदाई के क्षण उनके हृदय और स्मृति में सदा के लिए अंकित हो गए।


मुख्य बिंदु

  • ब्रज गोपिका धाम में एक सजीव सप्ताह

  • २५० से अधिक बच्चों ने किया परिवर्तनकारी अनुभव

  • समग्र शिक्षा पद्धति: आध्यात्मिक जागरण, बौद्धिक प्रेरणा, और शारीरिक सक्रियता


प्रातःकालीन लय

  • आरती और कीर्तन

  • ऊर्जावान योग और ज़ुम्बा सत्र


बौद्धिक और नैतिक विकास

  • साधक व साधिकाओं के साथ वेदिक गणित और जीवन कौशल सत्र

  • सूक्ष्म नैतिक संदेशों से भरपूर रोचक वीडियो शो


ईश्वर से जुड़ाव

  • पूज्यनीय रासेश्वरी देवी जी (माँ) और स्वामी युगल शरण जी (बाबा) के साथ सत्र

  • सुरमयी कीर्तन, प्रश्नोत्तर और आत्मीय संवाद


कुछ सकारात्मक परिवर्तन

  • अच्छे स्वभावों को अपनाना: जल्दी उठना, व्यक्तिगत स्वच्छता, आभार व्यक्त करना

  • टीमवर्क, नेतृत्व और सेवा भावना को बढ़ावा देने वाली गतिविधियाँ

  • ईश्वर से गहरा जुड़ाव और मित्रता का निर्माण

  • अच्छे मूल्यों और सेवा के महत्व की समझ

  • विदाई के आँसू और हर्ष की छाप


हमारी आशा: 

यह कार्यक्रम हमारी अगली पीढ़ी को इस भौतिकवादी संसार के कांटों के बीच से अधिक सकारात्मक रूप में आगे बढ़ने में मदद करे।


निष्कर्ष

सनातन वैदिक धर्म की प्रामाणिकता को बनाए रखते हुए, शिक्षाएँ अपनी मौलिकता में अडिग रहीं, परंतु उन्होंने अधिक पेशेवर अभिव्यक्ति अपनाई। यह कार्यक्रम बच्चों के लिए शिक्षा और विकास के आयामों पर केंद्रित था। विशिष्ट गतिविधियाँ और सत्र शामिल किए गए, ताकि वे जीवन की वास्तविकताओं की समग्र समझ प्राप्त कर सकें।

 



राधे राधे

 
 
 
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