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मध्य एवं पूर्वी भारत में आयोजित आध्यात्मिक रिट्रीट्स ने साधकों को भक्ति-पथ पर किया प्रेरित

लेखक की तस्वीर: BGSM
BGSM
27 जुल॰
3 मिनट पठन

अपडेट करने की तारीख: 28 जुल॰


जुलाई 2026 के दौरान डॉ. स्वामी युगल शरण जी के दिव्य मार्गदर्शन में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं झारखंड के विभिन्न नगरों में आध्यात्मिक रिट्रीट्स का आयोजन किया गया। शहडोल, कोरबा, बालोद, रामगढ़ और गिरिडीह में आयोजित इन रिट्रीट्स ने सैकड़ों साधकों को सत्संग, भक्ति साधना, ध्यान, कीर्तन तथा शास्त्रीय चिंतन के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति का अनुपम अवसर प्रदान किया। इन आयोजनों ने अनेक जिज्ञासुओं के हृदय में भक्ति, श्रद्धा और ईश्वर-प्रेम की नई चेतना जागृत की।


इस आध्यात्मिक यात्रा का शुभारम्भ 10–12 जुलाई को शहडोल (मध्य प्रदेश) से हुआ। अमरकंटक की पावन भूमि के निकट स्थित इस क्षेत्र में साधकों ने सत्संग एवं आत्मचिंतन के माध्यम से मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य पर मनन किया। डॉ. स्वामी युगल शरण जी ने अपने व्यावहारिक एवं प्रेरणादायी प्रवचनों में समझाया कि सच्ची शांति और परम आनंद केवल भगवद्भक्ति, संत-संग तथा नियमित साधना से ही प्राप्त हो सकते हैं।


इसके पश्चात 13–16 जुलाई तक कोरबा (छत्तीसगढ़) में रिट्रीट का आयोजन हुआ। हरित वनों, पावन नदियों तथा प्राचीन मंदिरों से घिरे इस क्षेत्र का शांत वातावरण साधना के लिए अत्यंत अनुकूल रहा। प्रतिदिन कीर्तन, ध्यान तथा शास्त्र-चर्चा के माध्यम से साधकों को विनम्रता, समर्पण और निरंतर भगवद्-स्मरण का अभ्यास कराया गया।


16–19 जुलाई तक बालोद में आयोजित रिट्रीट में भी भक्तों ने सत्संग, भजन, ध्यान एवं आध्यात्मिक चर्चाओं के माध्यम से भक्ति के गूढ़ सिद्धांतों को आत्मसात किया। डॉ. स्वामी युगल शरण जी ने बताया कि वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति तभी संभव है जब भक्ति केवल पूजा तक सीमित न रहकर जीवन के प्रत्येक कर्म का आधार बन जाए।


20–22 जुलाई तक झारखंड के रामगढ़ में आयोजित रिट्रीट ने साधकों को इस क्षेत्र की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ने का अवसर प्रदान किया। पावन तीर्थों एवं संत परंपरा से प्रेरणा लेते हुए साधकों ने भगवद्प्रेम, निष्काम सेवा और दृढ़ श्रद्धा के महत्व को समझा तथा अपने जीवन में उन्हें अपनाने का संकल्प लिया।


इस श्रृंखला का समापन 23–26 जुलाई को झारखंड के गिरिडीह में हुआ। शांत पर्वतों और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण इस क्षेत्र में साधकों ने भक्ति साधना, ध्यान, हरिनाम संकीर्तन एवं सत्संग के माध्यम से आत्मिक शांति और ईश्वर के प्रति अपने प्रेम को और अधिक गहन बनाया।


इन सभी रिट्रीट्स का एक विशेष आकर्षण रहा नगर परिक्रमा एवं हरिनाम संकीर्तन। जब श्रद्धालु राधा-कृष्ण के दिव्य नामों का संकीर्तन करते हुए नगरों एवं ग्रामों की गलियों से होकर निकले, तब संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो उठा। यह परंपरा श्री चैतन्य महाप्रभु के उस दिव्य संकल्प की स्मृति कराती है—

"पृथिवीते आछे यत नगरादि ग्राम,

सर्वत्र प्रचार होइबे मोर नाम।"


हरिनाम संकीर्तन की यह परंपरा केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज भी संतों की वाणी के आधार पर समझाते थे कि जो जीव स्वयं भगवान का नाम नहीं ले सकते, वे भी केवल हरिनाम का श्रवण करके आध्यात्मिक कल्याण प्राप्त करते हैं—

"पशु पक्षी कीटादि बोलिए न पारे,

सुनिले हरिनाम तारा सब तरे।"


इसी भावना के साथ प्रत्येक नगर परिक्रमा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि समस्त जीवों तक हरिनाम की दिव्य ध्वनि पहुँचाने का करुणामय प्रयास बन गई।


इन सभी स्थानों पर आयोजित आध्यात्मिक रिट्रीट्स का उद्देश्य एक ही था—सनातन धर्म के शाश्वत संदेश का प्रचार तथा प्रत्येक साधक को भक्ति-पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देना। सत्संग, सेवा, भगवद्-स्मरण और हरिनाम संकीर्तन के माध्यम से प्रतिभागियों ने न केवल अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त किए, बल्कि अपने दैनिक जीवन में भक्ति को और अधिक दृढ़ता से अपनाने का संकल्प भी लिया।


डॉ. स्वामी युगल शरण जी के मार्गदर्शन में आयोजित ये आध्यात्मिक रिट्रीट्स संत परंपरा की उसी महान विरासत को आगे बढ़ाते हैं, जिसका उद्देश्य नगर-नगर और ग्राम-ग्राम तक भगवान के पावन नाम तथा दिव्य प्रेम का संदेश पहुँचाना है। ऐसी दिव्य साधना-यात्राएँ अनगिनत साधकों के जीवन में भक्ति, शांति और भगवत्प्रेम का प्रकाश फैलाती रहें—इसी मंगलकामना के साथ।

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