शास्त्र प्रमाण: सबसे प्रामाणिक प्रमाण
- Swami Yugal Sharan Ji

- 9 अप्रैल 2025
- 3 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 16 अप्रैल 2025

ईश्वर के अस्तित्व को लेकर बहस कोई नई नहीं है। यह एक प्राचीन विषय है जिसमें आस्तिक और नास्तिक दोनों पक्ष तर्कों का सहारा लेते हैं। भारतीय दर्शन में ‘प्रमाण’ नामक एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। किसी भी विचार को प्रमाणित या खंडित करने के लिए तर्क को प्रमाणों के अनुरूप प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। तीन प्रमुख प्रमाण हैं: प्रत्यक्ष प्रमाण, अनुमान प्रमाण, और शब्द प्रमाण।
1) प्रत्यक्ष प्रमाण (Pratyaksha Pramana):
नास्तिकों का तर्क प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित होता है, जिसे चार्वाक ऋषि ने प्रचारित किया था। प्रत्यक्ष अर्थात पाँच इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त ज्ञान, विशेषतः आँखों द्वारा देखे गए दृश्य। “Seeing is believing” (जो देखा वही सत्य है) – यह नास्तिकों का प्रिय वाक्य है, परंतु इसके स्पष्ट सीमाएँ हैं।
उदाहरण के लिए:
हम प्रतिदिन देखते हैं कि सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर जाता है, परंतु वास्तव में पृथ्वी घूमती है, सूर्य नहीं।
दिन में आसमान में तारे नहीं दिखते, इसका अर्थ यह नहीं कि तारे हैं ही नहीं।
जब उंगली को आधा पानी में डुबोते हैं तो वह छोटी प्रतीत होती है, जबकि वह वैसी ही रहती है।
इससे स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष ज्ञान सीमित होता है और उस पर पूर्णतः विश्वास नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि वैज्ञानिक अनुसंधान समय-समय पर पुराने सिद्धांतों को खंडित करते रहते हैं। जैसे कान जीभ के विषय को अनुभव नहीं कर सकता, वैसे ही भौतिक इन्द्रियाँ दिव्य भगवान को अनुभव नहीं कर सकतीं।
2) अनुमान प्रमाण (Anumana Pramana):
हम एक घटना देखकर दूसरी का अनुमान लगाते हैं। जैसे पहाड़ पर धुआँ देखकर हम अनुमान लगाते हैं कि वहाँ आग लगी है। इसी प्रकार इस ब्रह्मांड की व्यवस्थित रचना, सौरमंडल, आकाशगंगाएँ इस बात का संकेत देती हैं कि कोई महान नियंता है जो इस सबका संचालन कर रहा है।
परंतु सभी अनुमान केवल अनुमान ही होते हैं। उदाहरण स्वरूप, यदि अंधों का एक समूह हाथी को छूकर पहचानने की कोशिश करे, तो हर कोई अलग अनुभव देगा – कोई कहेगा दीवार, कोई रस्सी, कोई स्तंभ। ये सभी अनुभव गलत नहीं होंगे, पर अधूरे अवश्य होंगे।
3) शब्द प्रमाण (Shabda Pramana):
आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रमाण का सर्वोच्च स्रोत हैं – शब्द प्रमाण, अर्थात शास्त्र। विशेषतः वेद, जिन्हें स्वयं भगवान ने प्रकट किया है, ये प्रमाण सबसे अधिक प्रामाणिक हैं। प्रत्यक्ष और अनुमान – ये दोनों शब्द प्रमाण के सहायक मात्र हैं। ये भौतिक जगत को समझने में उपयोगी तो हैं, परंतु ईश्वर जैसे दिव्य तत्व को समझने में अक्षम हैं। जो प्रमाण मानव बुद्धि से प्राप्त होता है या भविष्य में होगा, वह भी भौतिक ही होगा। इसलिए भौतिक प्रमाणों से ईश्वर को जानना असंभव है।
पश्चिमी विद्वानों की वेदों में रुचि:
बीसवीं सदी की शुरुआत में कई पश्चिमी दार्शनिकों ने वेदों पर गंभीर शोध किया। जर्मन इंडोलॉजिस्ट पॉल जैकब ड्यूसन, जो स्वामी विवेकानंद के समकालीन थे, उन्होंने लिखा – “वेद ब्रह्म–आत्मा को एक अनुभव करने योग्य सत्य के रूप में वर्णित करते हैं, न कि परिभाषा योग्य।” एक अन्य जर्मन दार्शनिक, आर्थर शोपेनहावर ने कहा – “उपनिषदों का अध्ययन मेरे जीवन का सबसे लाभकारी और आत्मोन्नति देने वाला कार्य रहा है। यह मेरे जीवन की शांति रहा और मेरी मृत्यु का भी यही सहारा होगा।”
निष्कर्ष:
ईश्वर को बुद्धि, तर्क या वैज्ञानिक शोध से नहीं जाना जा सकता – केवल प्रेम और श्रद्धा से ही ईश्वर को पाया जा सकता है। नास्तिक तर्क के माध्यम से अपनी बात को प्रमाणित करने की हर संभव कोशिश करते हैं, परंतु आज तक कोई भी ईश्वर के अस्तित्व को खंडित करने का एक भी ठोस प्रमाण नहीं दे सका है।
राधे राधे।



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